किसी भी तरह सत्ता हथियाने का साधन बनकर रह गई है राजनीति

वर्तमान की दलबदल की गाथा की निंदा करने वालों को इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि क्या वे एक समय में कुशलतापूर्वक सत्ता हथियाने का वही खेल नहीं खेल रहे थे जो 60, 70, अस्सी, 90 और उसके बाद के दशकों में खेला जा रहा था । सरकारों को गिराने और बचाने के उन घिनौने खेल को कौन भूल सकता है जब ’आया राम गया राम’ उन्हीं राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली राजनीति की रीढ़ थी जो राजनीतिक नैतिकता के पतन पर आज घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। अब जो सवाल पूछा जाना चाहिए वह यह है कि क्या कभी ऐसा समय था जब नैतिकता और सिद्धांत हमारे राजनेताओं की पसंद को परिभाषित करते थे? दुख की बात है कि इस प्रश्न का उत्तर ’कभी नहीं’ है।

विजय शंकर पांडेय

हमारे राजनीतिक समुदाय द्वारा अपने गिरगिटिया रंग को एक बार फिर बेशर्मी से प्रदर्शित किया जा रहा है। महाराष्ट्र में जो हुआ वह हमारे देश में कई दशकों से होता आ रहा है। लगभग एक साल से महाराष्ट्र में चल रहे नाटक के बारे में विजेता और हारने वाले, दोनों अपनी-अपनी राय का ढिंढोरा पीट रहे हैं। हारने वाले इसे लोकतंत्र की हत्या बताते हैं जबकि जीतने वाले इसे राष्ट्रहित में कार्य करना बताते हैं। राजनीतिक उछल-कूद की इस घटना में जो लोग आज घायल हुए हैं, वे म्यूजिकल चेयर की इसी कला में माहिर होने के लिए जाने जाते थे। अफसोस, उनके चेलों ने गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर उसी दाव /नॉकआउट झटका के साथ अपने ही गुरु जी को धोखा दिया है। हमारी सांस्कृतिक परंपरा में, गुरु की सफलता तब सर्वाेत्तम होती है जब उसके चेले उससे आगे निकल जाएं इसलिए जी कुछ भी हुआ उसपर गुरु को नाराज होने के बजाय अपने शिष्य की सफलता पर प्रसन्न होना चाहिए लेकिन ऐसा लगता है कि चेला अपने गुरु को मिलने वाली ’दक्षिणा’ भी देने के मूड में नहीं है ।
वर्तमान की दलबदल की गाथा की निंदा करने वालों को इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि क्या वे एक समय में कुशलतापूर्वक सत्ता हथियाने का वही खेल नहीं खेल रहे थे जो 60, 70, अस्सी, 90 और उसके बाद के दशकों में खेला जा रहा था । सरकारों को गिराने और बचाने के उन घिनौने खेल को कौन भूल सकता है जब ’आया राम गया राम’ उन्हीं राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली राजनीति की रीढ़ थी जो राजनीतिक नैतिकता के पतन पर आज घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। अब जो सवाल पूछा जाना चाहिए वह यह है कि क्या कभी ऐसा समय था जब नैतिकता और सिद्धांत हमारे राजनेताओं की पसंद को परिभाषित करते थे? दुख की बात है कि इस प्रश्न का उत्तर ’कभी नहीं’ है। जब राजनीति में प्रवेश करने वालों ने अपने जीवन के किसी भी मोड़ पर कभी भी नैतिक आचरण का प्रदर्शन नहीं किया, तो हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि राजनीति में आने के बाद वे अब नैतिक आचरण करना शुरू कर देंगे?
नैतिकता और सच्चाई ऐसे गुण हैं जिन्हें किसी व्यक्ति की अंतर्निहित संस्कृति का हिस्सा बनने के लिए वर्षों के कठोर अभ्यास की आवश्यकता होती है। सत्ता हासिल करने के लिए झूठे ढकोसले और छल को अपने एकमात्र शस्त्रागार के रूप में इस्तेमाल करने वालों से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे सम्मानजनक विकल्प चुनेंगे और लोगों को न्याय और कल्याण देने का प्रयास करेंगे ।
राजनीति मूल रूप से अपने घोषणापत्र के माध्यम से अपने कार्यक्रमों और नीतियों का विवरण देकर लोगों तक पहुंच कर सत्ता हासिल करने का एक साधन है, लेकिन दुर्भाग्य से, ऐसा कभी नहीं हुआ। राजनीति किसी भी तरह सत्ता हथियाने का साधन बनकर रह गयी है और नैतिकता एवं सदाचार से विहीन हो गयी है। इसकी प्रकृति ही एक महत्वाकांक्षी आकांक्षी को अनैतिक और असामाजिक आचरण की ओर धकेलती है क्योंकि सत्ता की लालसा कमजोर नैतिकता वाले लोगों को अंधा कर देती है। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि राजनीति नैतिक सिद्धांतों से परिपूर्ण होनी चाहिए। वह न केवल इस अवधारणा के प्रबल समर्थक थे कि राजनीति को सत्य और नैतिक आचरण से ओत-प्रोत होना चाहिए, बल्कि उन्होंने सत्य की राजनीति का अभ्यास भी किया। वह राजनीति का स्वरूप बदलकर उसे सत्य और नैतिकता पर आधारित करना चाहते थे। गांधी जी का दृढ़ विचार था कि राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए केवल ईमानदार साधनों का ही उपयोग किया जाना चाहिए। इसकी तुलना आज की राजनीतिक संस्कृति से अगर हम करें तो पायेंगे कि आज केवल धनबल, बाहुबल, जातिवाद और झूठा प्रचार हर राजनीतिक दल को परिभाषित करता है। आज कोई भी जाति, धर्म और काले धन के बिना राजनीति की कल्पना नहीं कर सकता। एक बार जब ये हमारी राजनीतिक संस्कृति का अभिन्न आधार बन गए तो नैतिक राजनीतिक व्यवहार की किसी भी बात का कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि आज की राजनीति में कुछ भी नैतिक नहीं है। राजनीतिक संस्कृति का जिस तेजी से पतन हो रहा है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वह लगातार पतन की ओर अग्रसर है।
ऐसी स्थिति में नागरिकों को देश की राजनीतिक स्थिति के बारे में चिंता जरूर करनी चाहिए क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक देश के जीवन में राजनीति सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। प्रसिद्ध राजनीतिक सिद्धांतकार, रूसो ने ’द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ में लिख कर सदियों पहले सरकार के सदस्यों के आत्म-केंद्रित व्यवहार के बारे में चेतावनी दी थी । रूसो के अनुसार लोगों की कीमत पर अनिवार्य रूप से अपने निजी हितों को आगे बढ़ाने के लिए अपनी स्थिति की शक्ति का राजनीतिक लोग अवश्य ही करेंगे । वह इसे ’अपरिहार्य और अंतर्निहित दोष’ कहते हैं जो सभी राजनीतिक संगठनों को वैसे ही प्रभावित करता है जैसे उम्र बढ़ने से मानव शरीर प्रभावित होता है। इसलिए, हमारे राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह का पतन दिखाई दे रहा है, वह आश्चर्यजनक नहीं है। आश्चर्य की बात यह है कि हम, लोग, इतने चुप कैसे रह सकते हैं? क्या हमने इसे अपनी नियति माँ लिया है? हमें जवाबी कार्रवाई करनी चाहिए और जो सड़ांध पैदा हो गई है उसे ठीक करना शुरू करना चाहिए। जब तक हमारे देश में राजनीति साफ नहीं हो जाती और भ्रष्टाचार का संकट दृढ़ संकल्प से दूर नहीं हो जाता, हम एक भ्रष्ट राष्ट्र बने रहने की बदनामी झेलेंगे । हमारे देश को राजनीतिक वर्ग ने एक प्रकार से विफल कर दिया है और उसे अपनी पूरी क्षमता हासिल करने से रोक दिया है। चाहे हम निकट भविष्य में एक समृद्ध देश बनें या न बनें या पूरी तरह से विकसित हो जाएं, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या हमारी सरकारों ने काम किया और लोगों को उनकी क्षमता हासिल करने में मदद की। ऐसा करने के लिए राजनीति को स्वच्छ करना होगा और नीति एवं सदाचार को इसका आधार बनाना होगा। राजनीति के नाम पर दलाली का खेल हमारे देश में दशकों से सफलतापूर्वक खेला जा रहा है, और इसने हमें काफी हद तक कमजोर कर दिया है। आइये कार्रवाई करें और राजनीति को साफ़ करें। राज्य का मूल्य, अंततः, इसे बनाने वाले व्यक्तियों का मूल्य है। आइए अब से योग्य लोगों का चुनाव करें।

(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)

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