चुनावी बॉण्ड से सत्ता और चंदे का गठजोड़ साफ़ है

सबसे बड़ा प्रश्न आज देश के सामने यह है कि इस तरह की असंवैधानिक और गोपनीयता भारी स्कीम राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए लेन का उद्देश्य क्या था ? देश की जनता को यह अच्छी तरह से पता है कि चुनावों में हज़ारों हज़ारों करोड़ का खर्च वर्षों से होता चला आ रहा है और यह सारा धन सिर्फ़ और सिर्फ़ काला धन रहा है । चुनावी बॉण्ड के माध्यम से पिछले छह वर्षों में राजनीतिक दलों को लगभग चौदह हज़ार करोड़ ही मिले लेकिन जब चुनावों में इससे कई कई गुना खर्च होने की बात जब जग ज़ाहिर है तो यह चुनावी बॉण्ड की स्कीम लाई ही क्यों गई क्योंकि चुनावी खर्चे की भरपाई तो इन बांडों से होने वाली नहीं थी , यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है ।

वी.यस.पाण्डेय

हाल ही में चुनावी बॉण्ड के ख़ुलासे को लेकर ख़बरों का बाज़ार गर्म है और तरह तरह की ख़बरें समाचार पत्रों में छप रही हैं । जो भी सूचनाएँ बाहर आ रही हैं उनसे एक बात तो साफ़ हो रही है कि चुनावी बॉण्ड के माध्यम से सभी राजनीतिक दलों और विशेष रूप से केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा तो काफ़ी धन इकट्ठा किया गया । अब तक छपी ख़बरों के अनुसार चुनावी बॉण्ड के माध्यम से इकट्ठा किए गए इस धन में सत्ता का दुरुपयोग किए जाने की बात साफ़ तौर पर उभर रही है । लेकिन इस खेल में हालाँकि सबसे ज़्यादा धन केंद्र में सत्ताधारी दल को प्राप्त हुआ है लेकिन राज्यों की सरकारों को चलाने वाले राजनीतिक दलों को भी हज़ारों करोड़ रुपये बॉण्ड के माध्यम से प्राप्त हुए , यह भी साफ़ है ।अभी तक बहुत सी सूचनाएँ बाहर नहीं आ पाई हैं और जैसे जैसे आगामी दिनों में सच्चाई सामने आएगी , पूरी तस्वीर और साफ़ होगी और पूरा खेल समझ में आने लगेगा ।

अब तक प्राप्त जानकारी से ऐसा लगने लगा है कि चुनावी बॉण्ड के माध्यम से जिसकी जितनी ताक़त थी , उसने उतना ज़्यादा बॉण्ड के माध्यम से धन प्राप्त किया ।इस दृष्टि से केंद्र में सत्तारुढ़ दल को सबसे ज़्यादा धन मिला और ऐसा होना स्वाभाविक ही था । लेकिन कई राज्यों में सत्ता सँभालने वाले दलों ने भी काफ़ी कुछ इकट्ठा किया यह भी स्पष्ट है । एक राज्य के सत्तारूढ़ दल ने जहां अकेले डेढ़ हज़ार करोड़ से ज़्यादा रुपयों के बॉण्ड स्वीकार किए वहीं एक दूसरे छोटे से राज्य के सत्तारूढ़ दल को एक हज़ार करोड़ से कुछ कम ही धन प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त है ।इसी तरह पहले दशकों तक देश पर राज कर चुकी पार्टी जो अब भी कुछ राज्यों में सत्तानशीं है , उसने भी लगभग डेढ़ हज़ार करोड़ की धनराशि इन चुनावी बांडों के माध्यम से इकट्ठा करने का सौभाग्य प्राप्त किया ।उपलब्ध डेटा से यह भी साफ़ हो गया कि सत्ता से बाहर दलों को बहुत ही कम पैसा बॉण्ड के माध्यम से मिला , सत्ता और चंदे का गठजोड़ साफ़ है ।

सबसे बड़ा प्रश्न आज देश के सामने यह है कि इस तरह की असंवैधानिक और गोपनीयता भारी स्कीम राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए लेन का उद्देश्य क्या था ? देश की जनता को यह अच्छी तरह से पता है कि चुनावों में हज़ारों हज़ारों करोड़ का खर्च वर्षों से होता चला आ रहा है और यह सारा धन सिर्फ़ और सिर्फ़ काला धन रहा है । चुनावी बॉण्ड के माध्यम से पिछले छह वर्षों में राजनीतिक दलों को लगभग चौदह हज़ार करोड़ ही मिले लेकिन जब चुनावों में इससे कई कई गुना खर्च होने की बात जब जग ज़ाहिर है तो यह चुनावी बॉण्ड की स्कीम लाई ही क्यों गई क्योंकि चुनावी खर्चे की भरपाई तो इन बांडों से होने वाली नहीं थी , यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है ।

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब यह स्कीम प्रथम दृष्टया ही असंवैधानिक लग रही थी जिसको कि अनावश्यक रूप से देश में स्थापित व्यवस्था के विपरीत गढ़ा गया तो इस स्कीम के बनते समय देश के बड़े बड़े पदों पर विराजमान सचिव , कैबिनेट सचिव , क़ानून विद् इत्यादि क्या सो रहे थे या उनकी आँख पर सत्ता सुख की पट्टी बंधी थी कि उन्हें इस स्कीम में कुछ भी ग़लत क्यों नहीं दिखा और यह सभी आँख मूँद कर फ़ाइलों पर अपनी अपनी सहमति और अनुमोदन क्यों देते रहे? राजनीतिक दलों की चाल और चरित्र से तो सभी अवगत है कि यह सभी चुनाव जीतने के लिए जाति, धर्म , काले धन और बाहुबल पर निर्भर है इस लिये इनका असंवैधानिक आचरण कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता लेकिन ईमानदार व्यवस्था की पैदावार उच्च पदों पर विराजित इन अधिकारियों ने कौन कौन से मर्ज़ अपने अंदर पाल लिए कि उनकी आँखें बंद हो चुकी हैं , कानों ने सुनना बंद कर दिया है और हाथों में सत्ता की हथकड़ी ऐसी जकड़ी है कि ग़लत को ग़लत लिखने का सामर्थ ही इनमें नहीं बचा ।इस चुनावी बॉण्ड की स्कीम को जहां देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक मत से असंवैधानिक घोषित किया वहीं शासन चलाने की वर्षों तक ट्रेनिंग पाये और क़ानून का राज वाले देश की व्यवस्था में तीन दशक से ज़्यादा समय तक उच्च पदों पर काम कर चुके लोगों को कैसे इस स्कीम में कुछ भी ग़लत नहीं दिखा , इसका हिसाब उन सभी को देना पड़ेगा जो उस समय और आज भी भारत सरकार के राजस्व विभाग , वित्त विभाग , न्याय विभाग जैसे संबंधित विभागों में सचिव, अतिरिक्त सचिव , संयुक्त सचिव , आदि पदों पर कार्यरत थे और सबसे ऊपर बैठे कैबिनेट सचिव के पद पर बैठे अधिकारी को भी । इन पदों को सुशोभित करने वाले शायद यह भूल गये हैं कि वह सिर्फ़ क़ानून के अनुसार कार्य करने के लिए नियुक्त हैं और उन का दायित्व है कि वह किसी भी के द्वारा नियम / क़ानून विरुद्ध दिये गये किसी आदेश को ना मानें।इस मामले में किसी भी स्तर पर यदि किसी भी अधिकारी ने इस असंवैधानिक बॉण्ड व्यवस्था का सशक्त और न्यायपूर्ण विरोध किया होता तो देश आज पैदा हुई इस असहज स्थिति से बच जाता ।इस मामले को उदाहरण बनाये हुए नीचे से सर्वोच्च स्तरों तक जिनमें राजनीतिक पद धारी भी शामिल हों , उन सभी लोगों पर इस असंवैधानिक व्यवस्था बनाने में अपना अपना योगदान देने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और दंडित किया जाना चाहिए

(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)

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