क्या आपने विकास को भागते हुए देखा है?

क्या चमकती आठ लेन एक्सप्रेसवे, रात के अँधेरे में रंग बिरंगी रोशनी से रोशन बहुमंजिला इमारतें, महंगी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, हवाई अड्डे विकास के पर्याय बन गए हैं ? क्या यह उचित है ? इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। हमें इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा क्यों विकास की मुख्यधारा से वंचित रह गया है। क्या ऐसे लोगों को भरण पोषण के लिए मुफ्त अनाज, प्रत्येक माह पेंशन के रूप में कुछ धनराशि सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर कर देने मात्र से सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है अथवा इसके लिए कुछ और करने की जरूरत है जिस पर अभी तक पर्याप्त काम नहीं किया गया है ? यदि हाँ , तो ये क्या हैं जिस पर काम करने की जरूरत है?

सुनील कुमार

यह सवाल कुछ अजीब लग सकता है, परन्तु यह है नहीं। यदि आप गंभीरता से सोचें तो यह सही प्रश्न प्रतीत होगा। विशेष कर जब हम अपने आसपास हो रही गतिविधियों को ध्यान से समझने का प्रयास करें।

कल्पना करें कि आप इस समय दिल्ली मुंबई एक्सप्रेसवे के किनारे खड़े हैं और अपने पास से तेज रफ़्तार चमकीली गाड़ियों को निकलते देख रहे हैं। आप का घर एक्सप्रेसवे से लगे हुए गांव में है। जब से इस एक्सप्रेसवे का निर्माण हुआ है गांव के लोगों का जीवन काफी बदल गया है। अब आप सीधे सड़क पर नहीं आ सकते हैं। आपको लम्बी दूरी संपर्क मार्ग पर तय करना पड़ता है और उसके बाद ही आप एक्सप्रेसवे पर चढ़ सकते हैं । उसके बाद कुछ दूरी तय करने के बाद टोल टैक्स भी चुकाना पड़ेगा। परन्तु बात यहीं पर ख़त्म नहीं होती है। अगर आपकी गाड़ी धीमी गति से चलने वाली है तो एक्सप्रेसवे पर चलना नामुमकिन है क्योंकि आप का चालान ट्रैफिक पुलिस के सचल दस्ते के द्वारा होना लगभग निश्चित है। और कमोबेश इसी प्रकार की स्थिति देश के दूसरे भागों में बनी एक्सप्रेसवे के निकट स्थित गांव के निवासियों की भी है। ऐसी स्थिति में आपके पास सड़क के किनारे खड़े होकर विकास को भागते हुए टुकुर टुकुर देखने के अलावा क्या विकल्प है ?

इसी तरह बड़े महानगरों के समीप बन रही बहुमंजली इमारतों, जिन्हें ‘गेटेड कम्युनिटी’ कहा जाता है, और जो ग्राम पंचायतों के सीमा के अंतर्गत आती हैं, के निवासियों और उनके रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन तथा ग्राम पंचायत के निवासियों और पंचायत के चुने हुए जनप्रतिनिधियों के बीच रिश्तों के बारे में सोचें तो यह अन्तर्द्वन्द बिल्कुल स्पष्ट हो जायेगा। सामान्यतया इनके बीच का रिश्ता एक प्रकार से भारत – पाकिस्तान के बीच के रिश्तों की तरह नज़र आएगा। जहाँ तक हो सके, बातचीत की नौबत भी नहीं आनी चाहिए। बस काम से काम रखें। गांव के लोग मेहनत मजदूरी करने के लिए ही सोसाइटी के अंदर दाखिल हो सकते हैं। सामाजिक सरोकार की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है। यदि सोसाइटी के निवासी संपत्ति कर पंचायत में जमा भी करते हैं तो बिलकुल मन मसोस कर। सोसाइटी भूजल का दोहन करता है, सूखा एवं गीले कूड़े का निस्तारण सही तरीके से करते हैं अथवा वह भी नहीं, यह बिल्डर और आर. डब्लू ए पर निर्भर करता है। अधिकांश जगहों पर इसकी कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होती है। कई बार इन सोसाइटी में काम करने वाले सुरक्षा कर्मी पहले उसी जमीन के मालिक हुआ करते थे। अब परिस्थितियों की मार के वजह से वहीँ अल्प वेतन नौकरी करने को मजबूर हैं।

ऐसी स्थिति में विकास की परिभाषा पर गौर करना आवश्यक हो जाता है। क्या चमकती आठ लेन एक्सप्रेसवे, रात के अँधेरे में रंग बिरंगी रोशनी से रोशन बहुमंजिला इमारतें, महंगी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, हवाई अड्डे विकास के पर्याय बन गए हैं ? क्या यह उचित है ? इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। हमें इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा क्यों विकास की मुख्यधारा से वंचित रह गया है। क्या ऐसे लोगों को भरण पोषण के लिए मुफ्त अनाज, प्रत्येक माह पेंशन के रूप में कुछ धनराशि सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर कर देने मात्र से सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है अथवा इसके लिए कुछ और करने की जरूरत है जिस पर अभी तक पर्याप्त काम नहीं किया गया है ? यदि हाँ , तो ये क्या हैं जिस पर काम करने की जरूरत है?

पिछले दशकों में कई अर्थशास्त्री तथा विकास विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि जब तक गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार पर गम्भीरतापूर्वक काम नहीं किया जायेगा तब तक विकास एक बड़ी जनसँख्या की पहुँच से बाहर रहेगा। मानव विकास सूचकांक की परिकल्पना इसी उद्देश्य से की गयी थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत ने मानव विकास सूचकांक में अपेक्षित प्रगति नहीं की है। अभी भी देश १३४ वें स्थान पर कायम है यद्यपि देश दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है और अगले कुछ वर्षों में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मानक पर देश अभी माध्यम विकासशील देशों की श्रेणी में ही है। इसी तरह अगर केवल आधारभूत सरंचनाओं के निर्माण पर ही जोड़ दिया जाता रहेगा तो शहर और ग्राम के बीच की खाई और आय असमानता और बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में ग्रामवासी तथा शहरी गरीब विकास को भागते हुए देखते रह जायेंगे। शिक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता है और इसकी जिम्मेदारी लोगों को स्वयं उठानी होगी। इस महत्वपूर्ण कार्य को विभागीय अधिकारियों पर नहीं छोड़ी जा सकती है।

वर्तमान में लगभग सभी राज्यों में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा से जुड़े विद्यालयों में अध्यापक की नियुक्ति, तैनाती तथा उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करना ही सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। और जब अध्यापक की हाजिरी सुनिश्चित करने में ही शिक्षा विभाग तथा सरकार विफल रही हैं तो छात्रों की उपस्थिति कम रहने पर अभिभावकों को क्यों दोष दें। आज अधिकांश सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन बस मुफ्त किताब, यूनिफार्म, जूते मोज़े लेने के लोभ में किया जा रहा है।

यदि आप पिछले चार दशकों में प्राथमिक शिक्षा में हुए प्रयोगों पर नजर डालें तो आप यह पाएंगे कि अस्सी के दशक में यह बताया गया कि ब्लैकबोर्ड की कमी की वज़ह से शिक्षा का गुणवत्ता ख़राब था। फिर नब्बे के दशक में विशेषज्ञों ने यह सुझाव दिया की स्कूल की पक्की ईमारत न होने तथा स्कूल की दूरी की वजह से बच्चे शिक्षा से मुँह फेर रहे थे। और फिर सरकार ने अध्यापकों को ठेकेदार बना दिया। इसी तरह मध्याह्न भोजन की व्यवस्था की जिम्मेदारी भी अध्यापकों पर ही डाल दी गई। और आज यह स्थिति है कि जो मूल प्रश्न पिछली शताब्दी के अस्सी के दशक में हमारे सामने थे वह आज भी हमारे सामने मुँह बाए खड़े हैं। हम उनका हल नहीं ढूंढ पाए हैं।

इसी बीच एक और बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। और वह है किस भाषा में बच्चों को पढ़ाया जाये। आज आम लोगों में यह भावना घर कर गयी है कि अंग्रेजी भाषा का ज्ञान विकास के लिए जरूरी है। इसके पीछे मुख्य कारण है समाज में अंग्रेजी के कद्रदानों को ऊँची तरजीह मिलना। आज अभिजात्य वर्ग अंग्रजी में रहता, बोलता तथा सोचता है। समाज में नेताओं, बड़े लोगों एवं नौकरशाहों के कथनी तथा करनी में सामान्य रूप से पाए जाने वाले अंतर को लोग देख एवं समझ सकते हैं। इसी वजह से एक मजदूर भी अपना पेट काट कर अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहता है। लोगों की भावना को समझते हुए अब कई राज्य सरकार अंग्रेजी मीडियम प्राथमिक विद्यालय की स्थापना कर रहे हैं। इसी प्रकार अब कंप्यूटर शिक्षा को भी प्रगति के लिए अनिवार्य मान लिया गया है। विद्यालयों में ‘स्मार्ट क्लासरूम’ की स्थापना कर शिक्षा की गुणवत्ता के सवाल का उत्तर ढूंढ लेने का दावा किया जा रहा है।

परन्तु सवाल का जवाब इतना सरल नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में सवाल सिर्फ खर्च बढ़ाने का नहीं है। हमें कुछ सवालों का जवाब ईमानदारी से ढूंढना होगा। सबसे पहले हमें इस प्रश्न का जवाब ढूंढना होगा की क्या प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था सही है अथवा उसे परिवर्तित करने की ज़रूरत है।

यदि आप इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो पाएंगे की पूर्व में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा अधिकांश राज्यों में जिला परिषद् के अधीन थी। आज भी कुछ राज्य जैसे महाराष्ट्र में यह व्यवस्था कायम है परन्तु अधिकांश राज्यों में यह राज्य सरकार के अधीन है। ७३ वें तथा ७४ वें संविधान संशोधन के फलस्वरूप यह विषय स्थानीय सरकार के हिस्से में आ गई है। लेकिन अभी तक इस विषय का स्थानांतरण ग्राम पंचायत तथा जिला पंचायत को नहीं किया गया है। कुछ राज्यों में तो अध्यापकों को राज्य कर्मचारी घोषित कर दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप अध्यापकों की नियुक्ति, तैनाती, स्थानांतरण, अवकाश देने आदि में एक बहुत बड़ा ‘वेस्टेड इंटरेस्ट ग्रुप’ खड़ा हो गया है और इनकी पहुँच ऊपर तक है। ऐसी दशा में स्थानीय सरकार के अंतर्गत इन्हे लाना कोई आसान काम नहीं रहा।

परन्तु यदि शिक्षा क्षेत्र में व्यापक सुधार लाना है तो इस सवाल का उत्तर शीघ्र ढूंढने की ज़रूरत है। यदि हम इस दृष्टिकोण से भी देखें कि इस विषय का सीधा सम्बन्ध किस वर्ग से है और वह कहाँ रहता है तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि बच्चे व उनके अभिभावक ग्राम पंचायत तथा नगर पंचायत अथवा नगरपालिका में रहते हैं और उनके सबसे निकट स्थानीय सरकार ही है। इसी स्तर पर सुनवाई एवं जवाबदेही का निर्धारण सबसे प्रभावी एवं कम समय में हो सकने की सम्भावना है। विश्व के अधिकांश देशों में भी यह विषय स्थानीय सरकार के ही अंतर्गत आती है। इस बात पर आम सहमति है कि जो सरकारी तंत्र लोगों के सर्वाधिक निकट है उसे ही लोक सेवाओं से जुड़े कार्य सम्पादित करना चाहिए। अतएव सबसे पहले हमें इस प्रश्न का हल ढूंढना होगा। और इसका उत्तर भी स्पष्ट है।

दूसरा महत्वपूर्ण विषय है विद्यालय का स्थान, उपलब्ध मूलभूत सुविधायें, छात्र क्षमता जिसके आधार पर अध्यापकों की संख्या का निर्धारण होता है आदि पर निर्णय लेना। यहाँ पर हमें कुछ महत्वपूर्ण विषय पर ग़ौर करने की ज़रूरत है। सभी अवगत हैं कि कई राज्यों में बहुत छोटी ग्राम पंचायत हैं और वहां पर प्राथमिक पाठशाला में सौ बच्चे भी मिलना मुश्किल हो रहे हैं। कई राज्यों में ऐसे प्राथमिक विद्यालयों की संख्या हजारों में है जहाँ पूरे विद्यालय में छात्रों की संख्या ५० से भी कम है। ऐसी दशा में प्रत्येक कक्षा में क्लास टीचर देने की व्यवस्था करना न केवल कठिन है परन्तु प्रशासनिक तथा आर्थिक रूप से अव्यावहारिक भी। कई राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में भी आबादी अब स्थिर हो रही है अथवा पलायन के फलस्वरूप घट रही है। इसके अलावा बड़ी संख्या में निजी स्कूल भी खुल गए हैं और उनमे भी बच्चे पढ़ रहे हैं। पिछले चौबीस वर्षों में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के सफल क्रियान्वयन के फलस्वरूप ग्राम एवं मजरे पक्की सड़कों से जुड़ गए हैं। कई निजी स्कूल के स्कूल बस २० किलोमीटर की दूरी तक से बच्चों को स्कूल लाने एवं वापस घर पहुँचाने के कार्य में लगी हुई हैं।

इससे यह साफ़ है कि कई प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों को प्रथम चरण में संविलयन कर एक उपयुक्त स्थान पर आधुनिक सुविधाओं से युक्त विद्यालय की स्थापना की जाने की ज़रूरत है। इसी वजह से ओडिशा सरकार ने हाल में कई स्कूलों के संविलयन का निर्णय लिया है। परन्तु वहां स्थानीय सरकार को इस कार्य में कोई भूमिका नहीं दी गयी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

मेरा यह मानना है कि इस कार्य में राज्य सरकार के साथ साथ स्थानीय सरकार यथा जिला परिषद्, ब्लॉक पंचायत तथा ग्राम पंचायतों की भी सहभागिता होनी चाहिए । ये विद्यालय आधुनिक सुविधाओं से लैस होने चाहिए – प्रत्येक कक्षा के लिए अलग कक्ष, २४x ७ विद्युत् एवं पेयजल व्यवस्था, इंटरनेट कनेक्शन, स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल लाइब्रेरी, खेल के मैदान, भोजन कक्ष आदि। इसी प्रकार प्रत्येक क्लास के लिए एक क्लास अध्यापक, विषयवार प्रशिक्षित अध्यापक और किसी अध्यापक के लम्बे अवकाश पर जाने की दशा में वैकल्पिक अध्यापक की व्यवस्था विद्यालय के स्तर पर ही संभव हो सकेगी। प्रत्येक विद्यालय में कम से कम ५०० से १००० बच्चे होते हैं तो अतिउत्तम होगा। सभी कक्षाओं के दो सेक्शन होंगे। इस प्रकार प्रत्येक कक्षा में ८० विद्यार्थी होंगे – दोनों सेक्शन मिलाकर। अतः अगर कक्षा १ से ८ तक के भी विद्यार्थी होंगे तो कुल विद्यार्थियों की संख्या लगभग ६४० होगी।

विद्यालय में पढाई का माध्यम प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा होगी और कक्षा ६ से अंग्रेजी माध्यम हो जाएगी। ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि अंग्रेजी का ज्ञान भविष्य में नौकरी प्राप्त करने से लेकर विषय से जुडी साहित्य के अध्ययन के लिए भी आवश्यक है। और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान ही भारतीय युवाओं को विदेशों में अतिरिक्त लाभ पहुंचा रहा है। प्रत्येक विद्यालय में भाषा लैब की स्थापना की जानी चाहिए ताकि कक्षा ६ एवं ऊपर के विद्यार्थी के उच्चारण स्पष्ट और बोलने में प्रवाह आ जाये। इससे उनका शब्द कोष भी धीरे धीरे सुधर जायेगा और उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा।

सभी छात्रों को घर से लाने एवं वापस भेजने हेतु स्कूल बस की व्यवस्था की जा सकती है और इस मद में खर्च का वहन सम्बन्धित ग्राम पंचायत कर सकती है। इस कार्य में स्थानीय सेवा प्रदाता को वरीयता मिलने से स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होंगे। विद्यालय के आस पास कॉपी किताब स्टेशनरी की दुकान भी खुल जायेंगे और बच्चों को दूर जाना न पड़ेगा। विद्यालय में मध्याहन भोजन बनाने की जिम्मेदारी किसी स्वयं सहायता ग्रुप को दिया जा सकता है अथवा सभी मध्याहन भोजन सेविकाओं को जोड़कर एक स्वयं सहायता समूह बना कर उन्हें यह दायित्व सौंपा जा सकता है।

विद्यालय के शैक्षणिक व अशैक्षणिक कर्मियों पर नियंत्रण जिला परिषद् का हो सकता है। इनकी वेतन मद में आवश्यक धनराशि का स्थानान्तरण राज्य सरकार द्वारा की जा सकती है। अध्यापकों के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी राज्य सरकार की रखी जा सकती है। धीरे धीरे अध्यापकों की नियुक्ति से लेकर समस्त प्रशासकीय जिम्मेदारी जिला परिषद् की होगी। जिस ग्राम पंचायत में विद्यालय स्थित होगा, वहां की शिक्षा स्थायी समिति विद्यालय के रखरखाव की जिम्मेदारी उठा सकती है अथवा इसमें विद्यालय के ग्राम पंचायतवार छात्रों की संख्या के हिसाब से प्रत्येक ग्राम पंचायत के योगदान का निर्धारण किया जा सकता है और उक्त धनराशि वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ में विद्यालय को दी जा सकती है।

अभी ग्राम पंचायतों में जो प्राथमिक विद्यालय भवन हैं और जो विद्यालयों के संविलियन के कारण रिक्त हो जाती हैं, उनका प्रयोग आंगनवाड़ी के बच्चों को pre -school शिक्षा देने के लिए किया जा सकता है अथवा वहां पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना की जा सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है की ग्राम पंचायत में स्थापित सभी लोक संपत्ति, चाहे वह किसी भी विभाग का हो, ग्राम पंचायत को हस्तांतरित हो जाये और उसके रखरखाव की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की हो । शिक्षा विभाग के अधिकारी आवश्यकतानुसार जिला परिषद् व ब्लॉक पंचायत के प्रशासनिक नियंत्रण में हो जायेंगे।

सभी ग्राम पंचायतों की शिक्षा स्थायी समिति का सदस्य सचिव शिक्षा विभाग द्वारा नामित अधिकारी अथवा विद्यालय का एक अध्यापक होगा। इस समिति की बैठक में सभी कार्यवाही को सुचारु रूप से सम्पादित करने की जिम्मेदारी सदस्य सचिव की होगी। ग्राम सभा की बैठक में शिक्षा से जुड़े सभी सवालों का जवाब तैयार करने की जिम्मेदारी सदस्य सचिव की होगी एवं उत्तर शिक्षा समिति के अध्यक्ष के माध्यम से ग्राम सभा को दी जाएगी।

प्रत्येक ग्राम पंचायत में बाल पंचायत की भी स्थापना की जाए और बच्चों को अपनी जरूरतों पर चर्चा कर पंचायत एवं ग्राम सभा के समक्ष अपनी बात रखने का अवसर मिले। इससे युवाओं में स्थानीय सरकार के बारे में सोच विकसित होगी, नेतृत्व क्षमता विकसित होगी और बालिग़ होने पर वे अच्छे नागरिक व वोटर भी बन सकेंगे।

इस रुपरेखा पर विस्तृत चर्चा करने की आवश्यकता है। जब प्रत्येक ग्राम पंचायत पर इन विषयों पर चर्चा होनी प्रारम्भ हो जाएगी तो शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़े सवालों का जवाब भी मिल जायेगा। यह आवश्यक है कि इस विचार विमर्श में अभिभावकों को भी जोड़ा जाये। जब सभी मिलकर ग्राम पंचायत में शिक्षा को बढ़ने के बारे में सोचेंगे तो समस्याओं का हल भी निकल जायेगा। सभी वयस्क को साक्षर बनाने के लिए ग्राम पंचायत विशेष अभियान स्थानीय लोगों के सहयोग से चला कर पूर्ण साक्षर पंचायत बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करेगी तो सभी ग्रामवासी गौरव भी महसूस करेंगे।

केरल में कई ग्राम पंचायतों ने दिव्यांग बच्चों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ग्राम पंचायत की ओर से विशेष रूप से प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति की है और ऐसे विद्यालयों का सफलतापूर्वक संचालन भी कर रहे हैं। यह अनुकरणीय पहल है।

बेहतर शिक्षा व्यवस्था ही विकास के बंद द्वार खोलने में मददगार होगी। अन्यथा विकास की दौड़ में गरीब, वंचित और ग्रामीण पीछे छूट जायेंगे। विकास को मानवीय एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों से जोड़ कर देखने की जरूरत है। इस प्रक्रिया में सभी की यथासंभव भागीदारी आवश्यक है। ऐसा करने के लिए यह जरूरी है कि ग्राम पंचायत के जागरूक नागरिक तथा जनप्रतिनिधि मिलकर ग्राम सभा में अपनी ग्राम पंचायत के विकास की रूपरेखा तय करें और उसपर मिलकर कार्य करें। विभागीय अधिकारियों की यह जिम्मेदारी है कि वे पंचायत को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में पूर्ण सहयोग प्रदान करें।

जिस दिन ग्रामवासियों के द्वारा बेहतर गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की मांग सरकार से की जानी लगेगी, उस दिन से सरकार पर दवाब बढ़ेगी और उसे गंभीरता से विचार कर कदम उठाने को मजबूर होना पड़ेगा। यदि ग्राम पंचायतों के जनप्रतिनिधि के द्वारा एक वैकल्पिक विकास का ब्लूप्रिंट भी प्रस्तुत कर दिया जाता है तो वह सोने पे सुहागा होगा। अतः यह समय की मांग है कि हम अपने भविष्य के बारे में स्वयं सोचें और अपनी सरकार के समक्ष अपनी बात सही तरीके से रखें। चकाचौंध पूर्ण विकास की रेस से बाहर निकलकर हमें अर्थपूर्ण विकास के बारे में सोचना होगा जहाँ विकास समाज एवं देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए अर्थपूर्ण हो जाता है। तभी हम विकसित देश बन सकेंगे। और इस प्रयोजन में हमें स्थानीय सरकार को मजबूत करने की दिशा में भी काम करना होगा।

– (लेखक पूर्व IAS अधिकारी हैं ; लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं )

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