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(Update 12 minutes ago)

भारत को अपने नागरिकों पर भरोसा करना सीखना चाहिए और औपनिवेशिक मानसिकता को त्याग देना चाहिए।

पूर्व आईएएस अधिकारी वी.एस. पांडे लिखते हैं कि हम इस तरह की व्यवस्था के साथ ‘विश्व गुरु’ नहीं बन सकते जो अपने ही लोगों पर अविश्वास करती है। यदि हम उन सुशासित देशों के समूह में शामिल होना चाहते हैं जहाँ कानून का शासन सर्वोपरि है, तो हमें सबसे पहले अपने कानूनों और संस्थानों को जानबूझकर औपनिवेशिक काल से मुक्त करना होगा। औपनिवेशिक काल के वे कानून जो स्वतंत्रता पर नियंत्रण को प्राथमिकता देते हैं, उनकी समीक्षा की जानी चाहिए और उन्हें निरस्त या पुनर्लिखित किया जाना चाहिए।
इस बात पर सबकी आम राय है कि भारत असीमित संभावनाओं वाला देश है, जिसे वह किसी न किसी कारणवश वह अब तक हासिल नहीं कर पाया है। प्रकृति ने इसे तमाम तरह के खनिज के भंडार से भरपूर तरह नवाजा है और हमारा देश अन्य तमाम प्राकृतिक सम्पदा से संपन्न हैं, जिनमें दुनिया की सबसे ज़्यादा सिंचित , उपजाऊ खेती लायक ज़मीन, भरपूर धूप, कोई खराब मौसम नहीं, नदियों का बड़ा नेटवर्क, बड़ा समुद्र तट, भरपूर बारिश वगैरह शामिल हैं। फिर भी, 77 साल के स्वशासन के बाद भी यह आज भी खुद को गरीब देशों की लाइन में खड़ा पाता है। सवाल यह है कि हम एक देश के तौर पर अपने पोटेंशियल तक पहुंचने में नाकाम क्यों रहे हैं। इस सवाल का जवाब आसान नहीं है क्योंकि कई ऐसे कारण हैं जो भारत नाम के इस महान देश को नीचे खींचते रहते हैं।
यदि हम इन स्थितिओं का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि इन कई कारणों में से अग्रणी कारण ज़िंदगी के हर क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार , करप्ट और विघटनकारी सोच वाली राजनीती जैसे फैक्टर्स के अलावा, एक और बहुत ज़रूरी फैक्टर है जिसने शुरू से ही हमारे लोगों की ज़िंदगी पर बहुत बुरा असर डाला है और हमारे देश को विकास के रास्ते पर जाने से रोका है और वह है हमारे सिस्टम का अपने ही नागरिकों पर अविश्वास। आज भी हमारी व्यवस्था कई तरह से अपने कॉलोनियल अतीत से मिली सोच से चल रही है , ऐसा साफ़ है —एक ऐसी सोच जो असल में अपने ही लोगों पर भरोसे नहीं करने की सोंच पर टिकी है। ज़ाहिर है, भारत में अंग्रेजों का राज नागरिकों की सेवा करने के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोगों को कंट्रोल करने और उनकी दौलत के लूट के लिए बनाया गया था। इसलिए उस समय के तमाम कानून, संस्थाएं और एडमिनिस्ट्रेटिव तरीके इस मूल धारणा को आधार बनाकर निर्मित किये गए थे कि मूल निवासी अव्यवस्था, बेईमानी और बगावत के लिए प्रवृत्त हैं, और इसलिए उन पर लगातार निगरानी, रेगुलेशन और दबाव की ज़रूरत थी। दुख की बात है कि राजनीतिक आज़ादी के बावजूद, भरोसे की यह बनावट आज भी मौजूद है।
साफ़ तौर पर भारत में ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेशन का मकसद कभी भी भारतीयों कि भलाई को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया था। यह एक विदेशी ताकत का राज करने का तरीका था जो बहुत कम लोगों के बूते पर एक बड़ी आबादी पर राज कर रही थी। कंट्रोल बनाए रखने के लिए, अंग्रेज़ बहुत ज़्यादा कागजी व्यवस्था , डॉक्यूमेंटेशन, परमिशन, पुलिसिंग और सज़ा देने वाले कानूनों पर निर्भर थे। इसलिए ब्यूरोक्रेसी को उसी हिसाब से दबदबे के साधन के तौर पर काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था और पाला गया था, न कि सेवा के तौर पर। डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर सबसे ताकतवर था; पुलिस का सम्मान करने के बजाय उससे डर लगता था; अदालतें दूर और धीमी थीं; और नागरिकों के साथ संभावित अपराधी जैसा बर्ताव किया जाता था। आम जान पर भरोसा नहीं था क्योंकि शासक का शासित लोगों के साथ कोई नैतिक या भावनात्मक रिश्ता था ही नहीं ।
आज़ादी के बाद भी, जब ब्रिटिश शासकों से सत्ता भारतीय लोगों के पास चली गई, लेकिन तब भी शासन करने की सोच काफी हद तक वैसी ही रही। एक लोकतान्त्रिक गणराज्य के हिसाब से संस्थाओं को फिर से डिज़ाइन करने के बजाय, भारत ने अक्सर स्थिरता के नाम पर निरंतरता को चुना। पुराने ज़माने के कानून बने रहे, नौकरशाही के ओहदे बने रहे, और प्रशासनिक समझ का दायरा बहुत छोटा रहा और साफ़ भी नहीं रहा। नतीजतन, आज भी देश कि सरकारें अक्सर नागरिकों पर विश्वास जताने के बजाय संदिग्ध मानती है। चाहे कोई सर्टिफिकेट, एफिडेविट, लाइसेंस, इंस्पेक्शन या परमिशन की ज़रूरत हो, अंदरूनी सोच यह है कि नागरिक तब तक धोखा देंगे जब तक उन पर सख्ती से कंट्रोल न किया जाए। कल्याणकारी कार्यक्रमों के लाभार्थियों को बार-बार अपनी गरीबी साबित करनी पड़ती रही है , बिज़नेस को हर कदम पर नियमों का पालन दिखाना होगा। टैक्सपेयर्स को तब तक दोषी माना जाता है जब तक वे बेगुनाह साबित न हो जाएं। यह गहरा संस्थागत अविश्वास राज्य-नागरिक संबंधों को खराब करता है।
आज साल 2026 में भी अधिकांशतः अविश्वास का माहौल ही सभी सेक्टर में दिखेगा। शासन में, नियम नतीजों पर हावी होते हैं, और समझ जवाबदेही पर हावी हो जाती है। अधिकारी फैसले लेने से डरते हैं क्योंकि सिस्टम ईमानदारी की गलतियों को सज़ा देते हैं लेकिन ईमानदारी या ईमानदार पहल को शायद ही कभी इनाम देते हैं। नागरिकों को छोटी-मोटी गलतियों के लिए भी परेशानी का सामना करना पड़ता है, जबकि बड़े अपराधी अक्सर जोड़ तोड़ करके बच निकलते हैं। पुलिसिंग में, कॉलोनियल सोच अभी भी साफ़ है। पुलिस को अभी भी मुख्य रूप से “लॉ एंड ऑर्डर” बनाए रखने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है, न कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए। प्रिवेंटिव अरेस्ट, बहुत ज़्यादा बल का इस्तेमाल और कानूनों का गलत इस्तेमाल इस सोच को दिखाता है कि प्रशासनिक तंत्र को समाज पर हावी होना चाहिए। 1861 का पुलिस एक्ट, जो बगावत को दबाने के लिए बनाया गया था, आज भी भारतीय पुलिसिंग के ज़्यादातर हिस्से को कंट्रोल करता है।
आर्थिक कारोबार , उद्योग और व्यापार में भी बहुत ज़्यादा रेगुलेशन और जांच पड़ताल उद्यमिओं पर भरोसे की कमी दिखाते हैं। भारत का बदनाम “इंस्पेक्टर राज” शायद कमज़ोर हो गया हो, लेकिन खत्म नहीं हुआ है। कंप्लायंस का बोझ ईमानदार बिज़नेस को इनफॉर्मैलिटी और भ्रष्टाचार में धकेलता है, जिससे इकोनॉमी और लोगों का हौसला कमज़ोर होता है।
हमारे नागरिकों पर अविश्वास पर आधारित व्यवस्था की हमें बहुत कीमत चुकानी पड़ी है। इससे करप्शन बढ़ता रहा है, क्योंकि जब कंप्लायंस मुश्किल और सज़ा देने वाला होता है, तो रिश्वत ही बच निकलने और सुरक्षित रहने का तरीका बन जाती है। यह इनोवेशन को हतोत्साहित करता है, क्योंकि लोग नाकामी और सरकारी कार्रवाई से डरते हैं। यह लोगों के आत्मविश्वास को कमज़ोर करता है, क्योंकि नागरिकों को बार-बार अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए विनती करने, लाइन में लगने और मजबूर होना पड़ता है।
सबसे ज़रूरी बात यह है कि अपने ही नागरिकों पर अविश्वास लोकतंत्र को ही कमज़ोर करता है। लोकतंत्र स्वेछा से कानून के पालन , नागरिक ज़िम्मेदारी और आपसी सम्मान पर फलता-फूलता है। जब सरकार नागरिकों पर भरोसा नहीं करती, तो नागरिक भी सरकार पर भरोसा करना बंद कर देते हैं। यह अच्छी स्थिति नहीं है , जिसको तत्काल बदला जाना लोकतंत्र के हिट में होगा।
(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)

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