यह तथ्य सर्वमान्य है कि देश में भ्रष्टाचार यानी चोरी सर्वत्र हो रही है । हमारा देश दुनिया के भ्रष्टतम देशों की सूंची में बहुत ऊपर विराजमान है और पूरी व्यवस्था ऊपर से नीचे तक आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है और आम जन का कोई भी काम बिना रिश्वत या सिफ़ारिश के हो पाना अत्यंत दुर्लभ है । देश की यह हालत पिछले चार- पाँच दशकों से चली आ रही है । ऐसी स्थिति में जब व्यवस्था के लोग कोई भी काम ठीक ढंग से या ईमानदारी से नहीं करते तो उनसे यह अपेक्षा किया जाना ही बेमानी है कि वह वोटर लिस्ट बनाने के काम को पूरी निष्ठा से करेंगे । जब हर दफ़्तर में हर टेबल पर हर दिन चोरी की जा रही तो वोटर लिस्ट बनाने में चोरी होने पर किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।
वी यस पाण्डेय
पिछले कुछ महीनों से देश की राजधानी में आंदोलनों के नाम पर अफ़रातफ़री का माहौल है । हर दिन कोई ना कोई किसी ना किसी के इस्तीफ़े की माँग को लेकर धरना – प्रदर्शन पर आमादा दिख रहा है ।जून महीने से काकरोचों का जलवा दिल्ली में दिखाई देने लगा । ना जाने कहाँ से एक आदमी रातों रात अपने करोड़ों फ़ॉलोअर बनाकर आंदोलन की खीर पकाने को कूद पड़ा और ना जाने कहाँ से बैठे बैठाए हज़ारों की भीड़ इकट्ठा होने लगी , करोड़ों रुपए के संसाधन जुट गए , मंच सजने लगे , अगुआ लोग देशभर में हवाई यात्राएँ करने लगे और इन सब के सामने दिल्ली पुलिस मानों नतमस्तक सी हो गई और ऐयर पोर्ट पर जा कर खुद ही आंदोलन की अनुमति देकर अपना धन्यभाग्य मानने लगी । फिर शुरू हुई इस्तीफ़ा माँगने की होड़ और उसकी शुरुआत नीट के पेपर लीक से शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से हुई और इस्तीफ़ा होने पर लगा कि देश तो साफ़ होने लगा ।अब मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े पर वर्तमान में बात अटकी है । लग तो ऐसा ही रहा है कि जैसे पहले पेपर लीक की समस्या काकरोचों ने चुटकी बजाते ही हल कर दी और अब बारी है देश में व्याप्त वोट चोरी की समस्या की समाप्ति की क्योंकि यह तो मानना ही पड़े गा कि यह तो देश के लोकतंत्र का बचाने का मामला है इसलिए इस मामले पर तो आर पार की लड़ाई हर दृष्टि से वाजिब है । साथ ही साथ आज कल सरकार के सामने खड़े हो गए है सभी विपक्षी दल और उनके नेता भी वोट चोरी का ख़ात्मा करके ही इस बार मानेंगे , ऐसा लग रहा है ।
जो बात चुनाव आयोग को लेकर निर्विवाद दिख रही है , वह यह है कि चुनाव आयोग ने कम्प्यूटर के प्रयोग के नाम पर वोटर का नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार आयोग के आई॰टी॰ सेल में केन्द्रितकर दिया जो बिलकुल ग़लत है । वोटर लिस्ट बनाने की पूरी ज़िम्मेदारी ज़िले स्तर पर ज़िला निर्वाचन अधिकारी यानी ज़िला मैजिस्ट्रेट एवं उनके अधीनस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों की होती है और यह मशीनरी प्रदेश स्तर के मुख्य चुनाव अधिकारी एवं चुनाव आयोग के अधीन उनके पर्यवेक्षण में कार्य करते हैं । सदैव से मतदाता सूंची का पुनरीक्षण एक सतत प्रक्रिया रही है और पुनरीक्षण के बाद ज़िले स्तर पर ही मतदाता सूंची प्रकाशित की जाती रही है । इसी प्रकार स्पेशल इंटेन्सिव रिवीजन का प्रविधान रेप्रेज़ेंटेशन ओफ़ पीपल्ज़ ऐक्ट १९५१ के तहत १९६० में बनाए गए रेजिस्ट्रेशन ओफ़ इलेक्टर्ज़ रूल्ज़ के नियम २५ में दिया गया है कि इंटेन्सिव रिविजन के दौरान मतदाता सूंची जैसे एकदम पहलीबार तैयार की जाती है , उस तरीक़े से तैयार किए जाने की व्यवस्था नियम में है । लेकिन अन्तमें पूरी सरकारी व्यवस्था को इस प्रकार से काम करना चाहिए ताकि वैध मतदाताओं और देश के नागरिकों का नाम बिना किसी परेशानी के मतदाता सूंची में आ जाए । ऐसा स्पष्ट है कि चुनाव आयोग और नीचे तक की उसकी मशीनरी इस बिंदु पर खरी नहीं उतर पाई जिसके परिणाम स्वरूप बड़ी संख्या में देश के वोटेरों और आम लोगों को कठिनाई हुईं।
अब प्रश्न यह है कि क्या यह सब “ वोट चोरी” करने के लिए किया गया ? यह तथ्य सर्वमान्य है कि देश में भ्रष्टाचार यानी चोरी सर्वत्र हो रही है । हमारा देश दुनिया के भ्रष्टतम देशों की सूंची में बहुत ऊपर विराजमान है और पूरी व्यवस्था ऊपर से नीचे तक आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है और आम जन का कोई भी काम बिना रिश्वत या सिफ़ारिश के हो पाना अत्यंत दुर्लभ है । देश की यह हालत पिछले चार- पाँच दशकों से चली आ रही है । ऐसी स्थिति में जब व्यवस्था के लोग कोई भी काम ठीक ढंग से या ईमानदारी से नहीं करते तो उनसे यह अपेक्षा किया जाना ही बेमानी है कि वह वोटर लिस्ट बनाने के काम को पूरी निष्ठा से करेंगे । जब हर दफ़्तर में हर टेबल पर हर दिन चोरी की जा रही तो वोटर लिस्ट बनाने में चोरी होने पर किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह निर्णय कौन करेगा कि कौन सी चोरी बड़ी या गम्भीर है और कौन सी चोरी ऐसी है जिसको अनदेखा किया जा सकता है । देश का सौभाग्य यह है कि हमने क़ानून के राज का सिद्धांत स्वीकार किया है जिसमें चोरी, चोरी होती है , बड़ी या छोटी नहीं । इस देश के सभी राजनीतिक दल इस देश में सरकारों को चलाने का अवसर पास चुके हैं और दुःखदतथ्य यह कि सब के सब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे रहे जिसका दुष्परिणाम पूरा देश दशकों से भुगत रहा । यह सर्वमान्य तथ्य है किवर्षों से चली आ रही भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ने देश को खोखला करके क़ानून के राज की चूल हिला कर रख दी है । लेकिन इन्हें अपने कुकर्म कभी नहीं दिखते और इस चल रहे नाटक में सभी छोटे बड़े , सत्ताधारी – विपक्षी दल सभी पूरी तरह से शामिल हैं ।एक चोरी बड़ी – दूसरी चोरी – चोरी ही नहीं , यह कदापि अस्वीकार्य है क्योंकि इसमें मनमाने पन की बदबू आती है ।
अगर देश से वास्तविक रूप से किसी भी दल को प्यार है और वह देश को प्रगति के पथ पर चलते हुए देखने की इच्छा रखता है तो उसे सबसे पहले अपने अंदर और पूरी व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार का ख़ात्मा करना होगा । लेकिन यह होना इस लिए असम्भव है क्योंकि सभी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के दलदल में वर्षों से गोता मार रहे हैं और इन सभी को तो अब उसी में दलदल में रहने की आदत हो चुकी है । यह अब नहीं सुधरेंगे , भ्रष्टाचार रूपी ज़हर इनकी नस नस में व्याप्त है । कहने का तात्पर्य है कि इनके बदलाव का समय बहुत पीछे छूट चुका है , बहुत देर हो चुकी है । नई राजनीति यानी ईमानदार नेतृत्व और जाति, धर्म, काले धन से मुक्त राजनीति ही आज देश की माँग है। इसके बिना अब कुछ भी और दूसरा रास्ता नहीं बचा है । अब यह आम जन को सोचना है कि वह कौन सा रास्ता चुनते हैं- सड़न का वर्तमान मार्ग या प्रगति और समृद्धि का भविष्य ।
(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)





