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(Update 12 minutes ago)

दुर्भाग्य से, भारतीयों को बड़े पैमाने पर होने वाली राष्ट्रीय चोरी की कोई परवाह नहीं

आप का भविष्य सिर्फ़ आप के हाथों में है जिसे आप अपने एक वोट से बदल सकते हैं । अपनी पुरानी गलतीयों को ना दोहराएँ । इन बेईमानों के लिए आपस में ना लड़ें और आँख कान खोल कर देखें कि आप के चारों तरफ़ क्या हो रहा और उसको कैसे ठीक किया जाए । समस्या भ्रष्ट रजनीति के ही कारण है और राजनीति से ही सब दूर भागने की बात कहते हैं ।

वी यस पाण्डेय

अमेरिका एवं विश्व के एक महान विचारक हेनरी डेविड थोरो ने अपने प्रसिद्ध लेख “ सिविल डिसओबीडीयन्स “ में यह लिखा कि यह बड़े आश्चर्य की बात है कि लोग अपनी सम्पत्ति , पैसे या सामान की चोरी हो जाने पर उसको वापस लाने के लिए सब कुछ करने को तैयार रहते हैं और तब तक चैन से नहीं बैठते जब तक कि वह अपना पैसा , सामान इत्यादि वापस नहीं पा लेते लेकिन जब समाज या देश की सम्पत्ति की चोरी या नुक़सान होता है तो अपने हाथ पर हाथ रख कर यह कहते हैं कि जो हुआ वह ग़लत लेकिन हम कर ही क्या सकते हैं और चुप चाप चोरी और अन्याय को होते हुए देखते रहते हैं ।”
यह प्रश्न बहुत ही महत्व पूर्ण है और आम लोगों के इस व्यवहार को समझना ज़रूरी है । फ़र्क़ है सामान्य चोर जो लोगों से चोरी करता है और ऐसे चोर में जो समाज और देश से चोरी करते है और इस श्रेणी में ऐसे लोग शामिल होते है जो ताकतवर होते हैं और ख़ास तौर पर सत्ता की चाभी जिनके जेब में होती है । लोक तंत्र में राजनीतिक लोगों के हाथ में ही सारी ताक़त होती है इसलिए जब वह भ्रष्ट हो जाते हैं तो देश और समाज पतन के रास्ते पर चल पड़ता है । इसलिए स्थितियों को भली भाँति समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि सामान्य चोर और राजनीतिक चोर में क्या फ़र्क़ होता है ?
पहला फ़र्क़ यह है कि जहाँ सामान्य चोर आप का विश्वास , आप का पैसा, आप का बैग, आप की घड़ी , आप के गहने चुराता है वहीं राजनीतिक चोर या भ्रष्ट नेता आप का भविष्य , आप का कैरीअर , आप की शिक्षा , आप की तंदुरुस्ती और आप का व्यापार और काम धन्दे चुराता है ।
दूसरी सबसे हास्यास्पद चीज़ यह है कि सामान्य चोर खुद यह चुनता है कि किसके यहाँ चोरी करनी है लेकिन राजनीतिक चोर को हम खुद ही चुनते हैं अपना सब कुछ उनसे चोरी कराने के लिए क्योंकि हम ही उन्हें चुनते हैं और उन्हें वोट देते हैं ।
तीसरा फ़र्क़ यह है कि हम लोग आँख मूँद कर यह कहते रहते हैं कि हम कोई अंधे थोड़ी ना हैं । कौन किसको धोखा दे रहा है ?इसमें सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि हम जहाँ अपनी सम्पत्ति को सामान्य चोर और डाकू से बचाने के लिए जी जान से कोशिश करते हैं वहीं राजनीतिक चोर को बचाने और उस की रक्षा करने के लिए हम आपस में एक दूसरे से लड़ते रहते हैं ? क्या यह सही नहीं है ? यही तो हम सब करते रहे हैं
यह सब ठग आपस में लड़ते रहते हैं लेकिन ज़रूरत पड़ने पर मिलकर स्वयं और एक दूसरे का बचाव करते रहते हैं जो आम जनता की प्रगति , उसके रोज़गार , उसका स्वास्थ्य , उसकी सफलता आदि सब कुछ लूटने के काम में रोज़ लगे हैं ।क्या यह शर्मनाक नहीं है? क्या यह अत्यंत आश्चर्य जनक नहीं है ?
हम सब को इस पर गम्भीरता से सोचना बहुत ज़रूरी है । यह सब सालों साल से होता चला आ रहा है लेकिन हम सब यह सब देखने के बाद भी सब कुछ चुप चाप देखते रहे हैं ।

अब और चुप नहीं बैठे रहना है , हम सब को कमान सम्हालनी होगी और चीज़ों को बदलने की प्रक्रिया में शामिल होना होगा ।हम सब को वहाँ खड़े होकर स्थितियों को देखना और बदलना होगा जहां से दशकों से जनता के हित के नाम पर यह सब लूट का साम्राज्य चलाया जाता रहा है । हम सब को निर्णय लिए जाने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भागीदार बनना ही पड़ेगा । हम सब संख्या बल में लूट मचाने वालों पर बहुत भारी पड़ेंग़े लेकिन राजनीति को गंदा खेल होना बता कर और डर कर हम सभी ने राजनीति को इन गंदे लोगों के हाथों में लूट मचाने के लिए छोड़ दिया और हम सब अपनी गलतफहमियों के चलते स्वेच्छा से इस खेल से बाहर हो गए । अब यही सब भ्रष्ट लोग मिलकर हमारे भविष्य और जीवन के बारे में निर्णय लेने लगे हैं । अब राजनीति गंदी है या नहीं क्या इस बात का कोई मायने बचता है ?
एक बात तो साफ़ है कि राजनीति गंदी हो या अच्छी लेकिन हम सब का भविष्य तो गंदा हो ही गया ।हमारा स्वास्थ्य गया , हमारा रोज़गार गया , हमारा भविष्य चौपट ही गया । क्या अब भी आप को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा । आँख खोलिए और इस बार सिर्फ़ और सिर्फ़ अकेली ईमानदार नेतृत्व वाली अकेली ईमानदार पार्टी को अपना समर्थन और वोट दें और इन बेईमानों को निकाल बाहर करें ।
आप का भविष्य सिर्फ़ आप के हाथों में है जिसे आप अपने एक वोट से बदल सकते हैं । अपनी पुरानी गलतीयों को ना दोहराएँ । इन बेईमानों के लिए आपस में ना लड़ें और आँख कान खोल कर देखें कि आप के चारों तरफ़ क्या हो रहा और उसको कैसे ठीक किया जाए । समस्या भ्रष्ट रजनीति के ही कारण है और राजनीति से ही सब दूर भागने की बात कहते हैं ।
इस बारे में प्रसिद्ध जर्मन विचारक और लेखक का कहना था कि “सबसे निरक्षर राजनीतिक निरक्षर है, वह न सुनता है, न बोलता है और न ही राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेता है। वह जीवन की कीमत नहीं जानता, सब्ज़ी की कीमत, मछली की, आटे की, किराए की, जूते की और दवा की, सब कुछ राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करता है। राजनीतिक अनपढ़ इतना मूर्ख है कि उसे गर्व है और यह कहते हुए अपना सीना फुला लेता है कि उसे राजनीति से नफरत है। मूर्ख नहीं जानता कि, उसकी राजनीतिक अज्ञानता से वेश्या, परित्यक्त बच्चा, और सबसे खराब चोर, बुरे राजनेता, राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भ्रष्ट और शराबी पैदा हुए हैं।”
(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)

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