राजेन्द्र द्विवेदी
वर्तमान दौर भारतीय शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक, शिक्षा के गिरते स्तर ने गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। कोरोना काल के बाद आए विभिन्न सर्वेक्षण स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि बच्चों की सीखने की क्षमता को गहरा आघात पहुंचा है। आज स्थिति इतनी दयनीय है कि छठी-सातवीं कक्षा के छात्र न तो ढंग से हिंदी पढ़ पाते हैं और न ही अपने स्तर के सामान्य गणितीय प्रश्नों को हल करने में सक्षम हैं।
वहीं उच्च शिक्षा का हाल और भी अधिक निराशाजनक है। मेडिकल जैसी अति-संवेदनशील पढ़ाई का ही उदाहरण लें, तो पांच वर्ष एमबीबीएस करने वाले डॉक्टरों के नीट-पीजी (NEET PG) परीक्षा में माइनस 40 अंक आ रहे हैं। विडंबना यह है कि आठ सौ अंकों की परीक्षा में काउंसलिंग के लिए क्वालीफाइंग परसेंटाइल को घटाकर शून्य कर दिया गया। यानी सिर्फ चार अंक पाने वाले भी एमडी में प्रवेश पा रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि नींव से लेकर शिखर तक हमारी शिक्षा व्यवस्था किस कदर खोखली हो चुकी है।
पढ़ाई के साथ-साथ परीक्षाओं का आयोजन भी घोर लापरवाही और तदर्थवाद का शिकार है। हाल ही में सीबीएसई 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में अपनाई गई ‘ऑन स्क्रीन मार्किंग’ प्रणाली इसका ज्वलंत उदाहरण है। कॉपियों की जांच में अप्रत्याशित रूप से अत्यधिक कठोरता बरती गई। सही उत्तर होने पर भी केवल स्टेप्स कम होने के कारण छात्रों के अंक काट लिए गए। इसे यदि एक अकादमिक फैसला मान भी लिया जाए, तो तकनीकी स्तर पर जो व्यवस्थागत खामियां रहीं, वे पूरी तरह से अक्षम्य हैं।
लाखों पन्नों को स्कैन करने में भयंकर गड़बड़ियां हुईं—किसी छात्र की कॉपी में पन्ने किसी और के जुड़ गए, तो कहीं धुंधले या एक ही पन्ने बार-बार अपलोड हो गए। इन गलतियों के बीच जब सख्ती से कॉपियां जांची गईं, तो जो नतीजे आए उन्होंने छात्रों और अभिभावकों को गहरे सदमे में डाल दिया।
इस अव्यवस्था का सबसे बुरा प्रभाव उन मेधावी छात्रों पर पड़ा, जिन्होंने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (JEE Mains) में बेहतरीन प्रदर्शन किया, लेकिन सीबीएसई की इस गड़बड़ी के चलते बोर्ड में 75 प्रतिशत अंक न ला पाने के कारण वे आईआईटी (JEE Advanced) की दौड़ से बाहर हो गए। सीयूईटी के जरिए केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाखिले में भी उन्हें नुकसान उठाना पड़ा।
जब मजबूर होकर लाखों छात्रों ने पुनर्मूल्यांकन का सहारा लेना चाहा, तो वह प्रक्रिया भी किसी मानसिक यातना से कम नहीं थी। वेबसाइट का क्रैश होना, भारी-भरकम फीस की मांग (जिसे बाद में हैकिंग बताकर पल्ला झाड़ लिया गया), और अंततः कॉपियां हाथ में आने पर वही पुरानी तकनीकी गड़बड़ियां सामने आना। बिना किसी पूर्व परीक्षण के 17-18 साल के मासूम किशोरों को एक नई प्रणाली का प्रयोग का साधन बना दिया गया। उनके कोमल मन पर क्या बीती होगी, इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।
सीबीएसई के बाद, नीट-यूजी परीक्षा ने भी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कलई खोल दी। परीक्षा के तुरंत बाद पेपर लीक की पुष्टि हो गई, जिसके चलते परीक्षा रद्द करनी पड़ी। हैरानी की बात यह है कि पेपर सेट करने वालों की गिरफ्तारी के बावजूद एनटीए के अधिकारी इसे अपने सिस्टम की नाकामी मानने को तैयार नहीं हैं। ठेके पर चल रही इस लचर व्यवस्था के कारण 23 लाख युवा एक बार फिर मानसिक तनाव झेलते हुए दोबारा परीक्षा देने को विवश हैं।
देश की सबसे प्रतिष्ठित यूपीएससी (UPSC) परीक्षा भी इस पतन से अछूती नहीं रही। हालिया प्रारंभिक परीक्षा में ऐसे अटपटे, लंबे और रटने वाले प्रश्न पूछे गए, जिनका कोई तार्किक आधार नजर नहीं आता। यह तर्क देना कि ऐसा छात्रों का कोचिंग से मोहभंग करने के लिए किया गया, नितांत हास्यास्पद है। यह सर्वविदित है कि परीक्षा का स्वरूप चाहे जो हो, आईएएस बनने का सपना देखने वाले छात्र कोचिंग का सहारा लेंगे ही।
कुल मिलाकर, शिक्षा प्रणाली और परीक्षाओं में हो रहे ये निरंतर खिलवाड़ सरकार के उदासीन रवैये को उजागर करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि शासन-प्रशासन को इस गिरती गुणवत्ता और ढांचागत कमियों की कोई परवाह नहीं है। आज शिक्षण संस्थानों में नियुक्तियों का आधार योग्यता और अनुभव न होकर, राजनीतिक निष्ठा और विचारधारा बन गई है।
शिक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनशील और भविष्य-निर्माता विभाग का नेतृत्व भी ऐसे लोगों को सौंपा जा रहा है, जिनकी पहचान शिक्षाविद् के रूप में नहीं, बल्कि कुशल चुनाव प्रबंधकों के रूप में है। कायदे से यह मंत्रालय उस व्यक्ति के हाथों में होना चाहिए जो शिक्षा की गहराई को समझता हो, नई प्रवृत्तियों से परिचित हो और जिसकी एकमात्र प्रतिबद्धता देश का भविष्य संवारने के प्रति हो।





