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(Update 12 minutes ago)

यूपी प्रशासन बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और जातिवाद के जाल में फंसा हुआ है।

उत्तर प्रदेश की यह त्रासदी रही है कि पिछले कई दशकों से राज्य का नेतृत्व भ्रष्ट और अकुशल हाथों में रहा । जाति ,धर्म और काले धन का राजनीति में खुल कर प्रयोग किया गया और चुनाव जीते गए । राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव जीतने के बाद जिसको भी मुख्य मंत्री नियुक्त किया उन सभी ने सभी स्थापित मूल्यों , व्यवस्थाओं की खुल कर अवहेलना की और इस बात की परवाह नहीं की कि उनके इस आचरण से प्रदेश किस प्रकार से गर्त की ओर अग्रसर हो रहा है ।

विजय शंकर पांडेय

उत्तर प्रदेश यदि सिर्फ़ जनसंख्या की दृष्टि से देखा जाए तो यह विश्व का छठवाँ सबसे बड़ा देश है । इसलिए इस राज्य का विकास की दृष्टि से पिछड़ा होना एक ख़तरनाक संकेत है। इस प्रदेश का प्रशासन स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों में अत्यंत प्रभावी एवं अच्छा माना जाता था लेकिन बाद के वर्षों में प्रदेश के प्रशासन के स्तर में लगातार गिरावट देखी गई । इस लगातार बिगड़ती प्रशासनिक व्यवस्था को देखते हुए यह प्रश्न उठता है कि उत्तर प्रदेश को इस हालत में पहुँचाने के लिए कौन ज़िम्मेदार है, वह कौन सी परिस्थितियों थी जिन्होंने राज्य को विकास के रास्ते से भटका दिया?
इस सवाल का जवाब खोजने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि संविधान द्वारा स्थापित व्यवस्था के तहत चुनी हुई सरकारों के पास ही सारी प्रशासनिक एवं अन्य शक्तियाँ निहित होती हैं। उत्तर प्रदेश की यह त्रासदी रही है कि पिछले कई दशकों से राज्य का नेतृत्व भ्रष्ट और अकुशल हाथों में रहा । जाति ,धर्म और काले धन का राजनीति में खुल कर प्रयोग किया गया और चुनाव जीते गए । राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव जीतने के बाद जिसको भी मुख्य मंत्री नियुक्त किया उन सभी ने सभी स्थापित मूल्यों , व्यवस्थाओं की खुल कर अवहेलना की और इस बात की परवाह नहीं की कि उनके इस आचरण से प्रदेश किस प्रकार से गर्त की ओर अग्रसर हो रहा है ।
नेताओं के इस आचरण का शुरुआती दिनों में प्रशासनिक व्यवस्था में से कुछ लोगों ने विरोध करने का कुछ प्रयास ज़रूर किया लेकिन विरोध करने वालों को धीरे धीरे अलग थलग कर दिया गया । जिसने भी भ्रष्टाचार का विरोध किया उसे दंड और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहन करने वाले अधिकारियों , कर्मचारियों को प्रोत्साहन देने के स्थान पर दंडित एवं प्रताड़ित किया गया । भ्रष्ट अधिकारियों को ही महत्वपूर्ण पदों पर रखे जाने की प्रथा पड़ गई । इन स्थितियों ने प्रदेश में कार्य संस्कृति को नष्ट कर दिया और प्रशासनिक व्यवस्था को भ्रष्ट बना दिया। पिछले कुछ दशकों की बात करें तो यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि पूरा तंत्र भ्रष्टाचार में डूब चुका है और इन स्थितियों से तंत्र को बाहर लाने की न तो किसी में क्षमता बची हैं और न ही इच्छाशक्ति।
आज के हालात यह हैं कि जो भ्रष्ट अधिकारी एक पार्टी के शासन काल में अति महत्वपूर्ण पदों पर थे वही अधिकारी दूसरी सत्ताधारी पार्टी के शासन काल मैं भी कमाऊ पदों पर आसीन रहे और धीरे धीरे ऐसे अफ़सर तीसरी सत्ताधारी पार्टी की सरकार मैं भी उच्च पदों पर पहुँच गए। कहने का मतलब यही है कि हर सरकार को भ्रष्ट अधिकारी भाते रहे हैं ।
दूसरी ओर जाति के आधार पर पूरे प्रशासनिक तंत्र को बाटने का जो खेल नब्बे के दशक मैं शुरू हुआ वह आज भी जोरशोर से जारी है। जहाँ एक पार्टी की सरकार के आते ही एक वर्ग के अधिकारी सत्ता के शीर्ष पर दिखते हैं वहीं दूसरी पार्टी की सरकार आते ही यह सभी गुमनामी मैं खो जाते हैं और उनकी जगह एक दूसरे वर्ग के अधिकारी ले लेते है। यही खेल आज भी उत्तर प्रदेश मैं चल रहा है । ऐसी स्थिति में विकास की ओर किसको देखने की फ़ुरसत है? उत्तर प्रदेश के प्रशासन की यही हालत पिछले कई दशकों से चली आरही है । भ्रष्टाचार और जातिवाद के चंगुल में फँसी इस प्रशासनिक तंत्र से तो अब उत्तर प्रदेश की आम जनता ने भी कोई अपेक्षा करना ही छोड़ दिया है , इन परिस्थितियों का दुष्परिणाम प्रदेश के पिछड़ेपन के रूप मैं आज सबके सामने है।
इसी के साथ यह भी स्पष्ट है कि राजनीतिक नेतृत्व शासन चलाने की क्षमता से विहीन रहे और उनमें से अधिकांश को सिर्फ़ चुनाव जीतने के नाम पर अकूत पैसा कमाने की लत लग चुकी है । प्रदेश को विकास के रास्ते पर किस प्रकार से ले जाया जा सकता है , इस पर ना तो उन्हें सोचने की फ़ुर्सत है और ना ही सोचने की क्षमता । जाति , धर्म , पैसे के बल पर चुनाव जीतने की प्रथा ने अपना रंग दिखाया और पूरा प्रशासनिक तंत्र भी जाति , धर्म और पैसे के आधार पर बट गया।
ऐसा नहीं है कि इन परिस्थितियों को बदलने की कोई कोशिश ना हुई हो । सन 1996 में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ प्रदेश की भारतीय प्रशासनिक सेवा एसोसिएशन ने एक बड़ा आंदोलन चलाया जिसके तहत अपने बीच से तीन महा भ्रष्ट आई॰ए॰एस॰ अधिकारियों को बैलेट पेपर के माध्यम से चुनने के लिए 14 दिसंबर 1996 और 1997 को दो बार वोटिंग कराई गई जिसमें तमाम विरोधों के बाद भी बहुत बड़ी संख्या में आई॰ए॰एस॰ अधिकारियों ने वोट डाल कर तीन महा भ्रष्ट अधिकारियों को चुना । अपने बीच से ही भ्रष्टाचार को समाप्ति करने के लिए आंदोलन चलाने और वोटिंग के माध्यम से महा भ्रष्ट अधिकारियों को चुनने का यह प्रयास एक ऐसा क़दम था जिसका कोई सानी नहीं है ।लेकिन राजनीतिज्ञों ने क्या किया – चिन्हित महा भ्रष्ट तीन आईएएस अधिकारियों में से दो को मुख्य सचिव के पद पर नियुक्त करके घोर दुस्साहस का परिचय दिया और स्पष्ट संकेत पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को दे दिया कि उनको तो बेईमान अधिकारी ही भाते है ।
निःसंदेह प्रदेश मैं आज भी वह सारी स्थितियाँ मौजूद हैं जो प्रदेश को ना केवल देश का बल्कि विश्व का सबसे विकसित भाग बना सकती हैं । ज़रूरत है सिर्फ़ एक ईमानदार , अनुभवी , निष्ठावान राजनीतिक नेतृत्व की जो प्रदेश को प्रगति के रास्ते पर ले जाने की सोंच , क्षमता एवं सामर्थ्य रखता हो । प्रदेश की जनता ऐसे राजनीतिक विकल्प का वर्षों से इन्तज़ार कर रही है।
(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)

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