यह प्रश्न लोगों के मन में उठना स्वाभाविक है कि जनता के धन को इतना अनाप शनाप ढंग से खर्च करके इन लोगों को क्या लाभ होता है जबकि यह नेता महत्वपूर्ण पदों पर बैठ कर जनता का जीवन सुखद और आसान बना कर लोगों का समर्थन आसानी से जीत सकते थे ।यह सवाल राजनीति विज्ञान और जनसंचार अध्ययन में लंबे समय से बहस का विषय रहा है, और इसका कोई आसान और सीधा उत्तर नहीं है।
वी यस पाण्डेय
समाचार पत्रों में हाल ही में यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई है कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार वित्त वर्ष 2017-18 से 2024-25 के बीच, यानी आठ वर्षों में, विज्ञापनों और प्रचार-प्रसार पर लगभग 6,812 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। इसका औसत प्रतिदिन खर्च लगभग सवा दो करोड़ रुपये (2.32 करोड़) बैठता है। विपक्षी नेताओं ने यह भी दावा किया है कि यदि वित्त वर्ष 2025-26 का प्रस्तावित बजट (918.83 करोड़ रुपये) भी जोड़ लिया जाए तो यह आँकड़ा जल्द ही सात हज़ार करोड़ रुपये को पार कर जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि यह औसत खर्च केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के प्रचार बजट से भी अधिक बताया जा रहा है।
इसी प्रकार लोकसभा में सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री द्वारा दिए गए एक आधिकारिक जवाब के अनुसार, केंद्र सरकार ने वर्ष 2014-15 से 2024-25 के बीच, यानी लगभग ग्यारह वर्षों में, विज्ञापनों पर कुल 5,987.46 करोड़ रुपये खर्च किए। इस हिसाब से केंद्र सरकार का औसत दैनिक खर्च लगभग डेढ़ करोड़ रुपये बैठता है। तुलनात्मक रूप से देखें तो उत्तर प्रदेश जैसे एक राज्य ने आठ वर्षों में ही केंद्र सरकार के ग्यारह वर्षों के कुल खर्च से अधिक राशि प्रचार पर व्यय कर दी—यह आँकड़ा निश्चित रूप से गंभीर विश्लेषण की मांग करता है, विशेष रूप से तब जब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े परंतु आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहे राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं।
विज्ञापनों पर बेशुमार धन बहा कर अपने को महिमामंडित करने की इस प्रवृत्ति के जन्मदाता दिल्ली के पूर्वी मुख्यमंत्री और जेल की हवा खा चुके अरविंद केजरीवाल ने तो दिल्ली जैसे शहर वाले राज्य में ही हज़ारों करोड़ रुपए अपने को महिमामंडित करने पर जनता का पैसा फूकने की जो प्रथा शुरू की उसकी देखा देखी प्रचार प्रसार पर धन लुटाने की नक़ल देश भर में की जारही है । सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जरिये सामने आए आँकड़ों के अनुसार, 2015 में सत्ता संभालने के तुरंत बाद के वर्ष में ही (अप्रैल 2015 से मार्च 2016) दिल्ली सरकार ने प्रचार पर करीब 542 करोड़ रुपये खर्च किए थे। कोरोना काल में, अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के बीच अकेले, यह खर्च लगभग 293 करोड़ रुपये और 17 महीनों में कुल लगभग 490 करोड़ रुपये तक पहुँच गया था। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने अलग-अलग समय पर तीन वर्षों की अवधि में लगभग 1,100 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का आरोप भी लगाया। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली सरकार को फटकार लगाई थी कि विकास कार्यों की तुलना में प्रचार पर कहीं अधिक राशि खर्च की जा रही है।
यह प्रश्न लोगों के मन में उठना स्वाभाविक है कि जनता के धन को इतना अनाप शनाप ढंग से खर्च करके इन लोगों को क्या लाभ होता है जबकि यह नेता महत्वपूर्ण पदों पर बैठ कर जनता का जीवन सुखद और आसान बना कर लोगों का समर्थन आसानी से जीत सकते थे ।यह सवाल राजनीति विज्ञान और जनसंचार अध्ययन में लंबे समय से बहस का विषय रहा है, और इसका कोई आसान और सीधा उत्तर नहीं है।
एक पक्ष यह मानता है कि सरकारी प्रचार की सीमित परंतु वास्तविक भूमिका होती है—यह किसी योजना की जानकारी आम जनता तक पहुँचाने, सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करने और चुनावी माहौल में एक ‘ब्रांड इमेज’ बनाने में सहायक होता है। विशेष रूप से चुनाव से ठीक पहले के महीनों में विज्ञापन खर्च में भारी वृद्धि यह दर्शाती है कि राजनीतिक दल इसे एक प्रभावी उपकरण मानते हैं।
दूसरी ओर, संचार सिद्धांतकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग यह तर्क देता रहा है कि प्रचार का प्रभाव प्रायः सतही और अल्पकालिक होता है। नोम चॉम्स्की जैसे विचारकों ने अपने प्रसिद्ध सिद्धांत ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ में यह विश्लेषण प्रस्तुत किया है कि संस्थागत प्रचार-तंत्र जनमत को एक सीमा तक प्रभावित तो कर सकता है, परंतु यह वास्तविक अनुभव और ज़मीनी हकीकत का स्थान नहीं ले सकता। इस दृष्टिकोण के अनुसार, जब आम नागरिक का प्रत्यक्ष अनुभव—सड़क, बिजली, पानी, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा—विज्ञापनों में दिखाए गए दावों से मेल नहीं खाता, तो प्रचार का असर धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है और कभी-कभी उल्टा भी पड़ जाता है, जैसा कि “छवि बनाम असलियत” के अंतर को लेकर विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते हैं।
व्यावहारिक रूप से देखें तो चुनावी राजनीति में सत्य शायद इन दोनों धारणाओं के बीच कहीं है। शोध यह बताते हैं कि सुशासन, प्रत्यक्ष लाभ (जैसे मुफ्त बिजली-पानी, कल्याणकारी योजनाएँ) और सामाजिक-जातीय समीकरण चुनावी परिणामों पर प्रचार से कहीं अधिक गहरा प्रभाव डालते हैं। परंतु प्रचार पूरी तरह निष्प्रभावी भी नहीं होता—यह मतदाता के मन में सरकार को लेकर एक प्रारंभिक धारणा (परसेप्शन) बनाने और नकारात्मक खबरों के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में उपयोगी सिद्ध होता है। यही कारण है कि लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल—चाहे वे केंद्र में हों या राज्यों में—सत्ता में आते ही प्रचार बजट में उल्लेखनीय वृद्धि करते हैं।
यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि अच्छे काम का प्रभाव व्यापक और स्थायी है, तो सरकारें प्रचार पर इतना धन क्यों व्यय करती हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि आम जन का जीवन आसान और सुखद बनाने के लिए सबसे पहले सरकार और प्रशासन को भ्रष्टाचार से मुक्त करने जैसी आवश्यक स्थिति पैदा करनी होगी जो आज देश और सभी प्रदेशों के राजनीतिज्ञों और राजनीतिक दलों के बस की बात नहीं है क्योंकि इस दृष्टि से सभी सामूहिक रूप से भ्रष्टाचार के दलदल में गोते लगाए हुए हैं । ऐसी स्थिति में राजनीतिक लाभ के लिए झूठा दुष्प्रचार ही एक मात्र रास्ता बचता है जिस पर सभी दलों की सभी सरकारें दौड़ लगाने में अपनी पूरी ताकत लगाये हुए हैं ।
असली प्रश्न यह नहीं कि प्रचार पर खर्च हो या न हो, बल्कि यह है कि यह खर्च कितना उचित, पारदर्शी और अनुपात में है, तथा क्या यह वास्तविक विकास कार्यों की कीमत पर तो नहीं हो रहा।
(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)





