आज नोएडा में झुग्गी बस्तियां दिखाई देती हैं और कई नई बस्तियां विकसित हो रही हैं। यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता के रूप में देखने के बजाय एक गंभीर आवासीय असंतुलन के संकेत के रूप में समझने की जरूरत है।
वी यस पाण्डेय
नोएडा की पहचान आज देश के सबसे तेजी से विकसित होते नियोजित शहरों में होती है। चौड़ी सड़कें, ऊंची इमारतें, औद्योगिक क्षेत्र, आईटी कंपनियां और आधुनिक आवासीय परिसर इसकी तस्वीर का हिस्सा हैं। लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसा सवाल भी खड़ा है, जिसका समाधान अभी तक नहीं हो पाया है—नोएडा में काम करने वाले लाखों निम्न आय वर्ग के श्रमिकों के लिए रहने की व्यवस्था आखिर कहां है?
यह प्रश्न केवल झुग्गी-झोपड़ियों का नहीं, बल्कि शहर की नियोजन नीति, श्रम बाजार और किफायती आवास के बीच संबंध का है।
नोएडा मास्टर प्लान-2031 में लगभग 15,280 हेक्टेयर शहरीकरण योग्य क्षेत्र की योजना बनाई गई थी। इसमें लगभग 5,722 हेक्टेयर, यानी करीब 37.5 प्रतिशत क्षेत्र आवासीय उपयोग के लिए रखा गया। योजना में वर्ष 2031 तक लगभग 25 लाख की आबादी का अनुमान लगाया गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि मास्टर प्लान में आवासीय क्षेत्रों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), निम्न आय वर्ग (LIG), मध्यम आय वर्ग (MIG) और उच्च आय वर्ग (HIG)—सभी के लिए आवास की परिकल्पना की गई थी।
फिर भी आज नोएडा में झुग्गी बस्तियां दिखाई देती हैं और कई नई बस्तियां विकसित हो रही हैं। यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता के रूप में देखने के बजाय एक गंभीर आवासीय असंतुलन के संकेत के रूप में समझने की जरूरत है।
समस्या कितनी बड़ी है?
नोएडा में झुग्गियों की संख्या का कोई अद्यतन, व्यापक और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध 2026 का सर्वेक्षण नहीं है। लेकिन पुराने आंकड़े समस्या की गंभीरता का संकेत देते हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार नोएडा में 11,510 स्लम परिवारों में 49,407 लोग रहते थे। वहीं नोएडा प्राधिकरण और जिला प्रशासन के 2009-10 के सर्वेक्षण में केवल पांच औद्योगिक क्षेत्रों—सेक्टर 4, 5, 8, 9 और 10—में 11,565 झुग्गियां चिन्हित की गई थीं।
इनमें सेक्टर 4 में 489, सेक्टर 5 में 534, सेक्टर 8 में 5,586, सेक्टर 9 में 3,941 और सेक्टर 10 में 1,015 झुग्गियां थीं। अकेले सेक्टर 8 और 9 में कुल 9,527 झुग्गियां थीं, जो इन पांच क्षेत्रों की कुल संख्या का लगभग 82 प्रतिशत है।
यह आंकड़ा पुराना है और इसे वर्तमान स्थिति नहीं माना जा सकता। लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि नोएडा के नियोजित विकास के शुरुआती दशकों में भी कम आय वाले श्रमिकों के लिए आवास एक गंभीर समस्या था।
क्या प्राधिकरण ने आवास नहीं बनाए?
यह कहना भी सही नहीं होगा कि नोएडा प्राधिकरण ने गरीबों के लिए आवास बनाने का प्रयास नहीं किया। प्राधिकरण ने EWS, LIG और फैक्टरी श्रमिकों के लिए हजारों आवास बनाए। एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 2,760 EWS, 1,010 LIG और 4,952 फैक्टरी श्रमिक आवास बनाए गए थे।
झुग्गी पुनर्वास योजना के तहत सेक्टर 122 में लगभग 3,528 फ्लैट बनाए गए। इनमें से 2,064 लाभार्थियों को फ्लैट आवंटित किए गए।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया—क्या केवल फ्लैट बना देना ही किफायती आवास नीति की सफलता है?
रोजगार से दूर आवास कितना उपयोगी?
सेक्टर 122 में बनाए गए पुनर्वास फ्लैट मूल झुग्गी बस्तियों से काफी दूर थे। मूल बस्तियों में रहने वाले लोगों का रोजगार आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों, बाजारों, घरों और निर्माण स्थलों से जुड़ा था। कई लोगों ने शिकायत की कि नए स्थान पर जाने से उनका रोजगार प्रभावित होगा और आने-जाने का खर्च बढ़ जाएगा।
यह अनुभव हमें आवास की वास्तविक कीमत समझाता है। किसी गरीब परिवार के लिए मकान की लागत केवल मासिक किराया या किस्त नहीं होती। इसमें यात्रा का खर्च, काम पर पहुंचने में लगने वाला समय और रोजगार के अवसरों से दूरी भी शामिल होती है।
यदि किसी श्रमिक को सस्ता मकान तो मिल जाए, लेकिन रोजाना काम पर पहुंचने के लिए अधिक किराया देना पड़े और कई घंटे यात्रा में लगें, तो वह मकान व्यवहार में उतना सस्ता नहीं रह जाता।
फिर नई झुग्गियां क्यों बनती हैं?
यहीं नोएडा की आवास नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।नोएडा में उद्योग, निर्माण, घरेलू सेवाएं, सफाई, सुरक्षा, परिवहन, कचरा संग्रहण, रेहड़ी-पटरी और अनेक छोटे व्यवसाय बड़ी संख्या में कम वेतन वाले श्रमिकों पर निर्भर हैं। इन श्रमिकों को शहर में काम करना है, लेकिन उनके वेतन के अनुरूप औपचारिक आवास सीमित है।
नतीजा यह होता है कि जहां सस्ता औपचारिक आवास उपलब्ध नहीं होता, वहां अनौपचारिक आवास विकसित हो जाता है।
हाल के वर्षों में सेक्टर 78-79 में झुग्गियों के विस्तार की खबरें सामने आई हैं। सेक्टर 78 में लगभग 400 परिवारों वाली एक झुग्गी बस्ती में सफाईकर्मी, कबाड़ी, ई-रिक्शा चालक, घरेलू कामगार और दिहाड़ी मजदूर रहने की बात सामने आई। इसी तरह सेक्टर 93ए में भी कचरा बीनने वाले और अन्य प्रवासी श्रमिकों की बस्ती की रिपोर्ट हुई है।इससे एक बात स्पष्ट होती है—पुरानी झुग्गी हटाने से कम आय वाले श्रमिकों की आवासीय आवश्यकता समाप्त नहीं होती।
समस्या ‘अतिक्रमण’ से आगे की है
झुग्गी-झोपड़ी को केवल सरकारी जमीन पर अतिक्रमण मानकर हटाना प्रशासनिक दृष्टि से आसान समाधान हो सकता है, लेकिन इससे समस्या स्थायी रूप से समाप्त नहीं होती।यदि शहर को हजारों श्रमिकों की आवश्यकता है तो उन श्रमिकों के लिए रहने की व्यवस्था भी शहर की योजना का हिस्सा होनी चाहिए।
यहां एक बुनियादी सवाल है—जब नोएडा मास्टर प्लान में 5,722 हेक्टेयर भूमि आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित की गई थी और सभी आय वर्गों के आवास की बात कही गई थी, तो निम्न आय वर्ग के लिए पर्याप्त, रोजगार के निकट और वहनीय आवास क्यों नहीं विकसित हो पाया?
इसका उत्तर केवल ‘झुग्गीवासी अतिक्रमणकारी हैं’ कहकर नहीं दिया जा सकता।
समाधान क्या हो सकता है?
नोएडा को अब झुग्गी पुनर्वास की नीति को केवल विस्थापन और फ्लैट आवंटन के रूप में देखने के बजाय ‘वर्कर हाउसिंग पॉलिसी’ के रूप में विकसित करना चाहिए।
पहला, बड़े औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास किफायती किराये के आवास विकसित किए जाने चाहिए। हर श्रमिक घर खरीदना नहीं चाहता या खरीद सकता है।
दूसरा, जहां भूमि और पर्यावरण की दृष्टि से संभव हो, वहां इन-सीटू पुनर्वास किया जाना चाहिए। अर्थात लोगों को रोजगार से बहुत दूर भेजने के बजाय उसी क्षेत्र में बहुमंजिला आवास उपलब्ध कराया जाए।
तीसरा, बड़े आवासीय और वाणिज्यिक प्रोजेक्टों में किफायती आवास के लिए भूमि या आवास का निश्चित हिस्सा सुनिश्चित किया जा सकता है।
चौथा, पुनर्वास के साथ सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था को भी जोड़ा जाना चाहिए।
पांचवां और सबसे जरूरी कदम है—नोएडा में झुग्गी बस्तियों का नया व्यापक सर्वेक्षण। प्रत्येक बस्ती में परिवारों की संख्या, रोजगार, आय, वर्तमान निवास अवधि, कार्यस्थल से दूरी और पुनर्वास की स्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड बनाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
नोएडा में समस्या आवास की कुल कमी से अधिक उपयुक्त और वहनीय आवास की कमी तथा उसके गलत स्थान पर होने की प्रतीत होती है। शहर ने हजारों EWS और LIG आवास बनाए हैं और बड़े पैमाने पर निजी आवासीय विकास भी हुआ है। इसके बावजूद झुग्गियां बनी हुई हैं और कुछ नए क्षेत्रों में बढ़ी हैं।
इसलिए नोएडा की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी ऊंची इमारतें बनीं या कितने करोड़ रुपये का आवास बिका। एक नियोजित शहर की वास्तविक सफलता यह भी है कि वहां काम करने वाला सफाईकर्मी, फैक्टरी मजदूर, घरेलू कामगार, सुरक्षा गार्ड, चालक और निर्माण श्रमिक भी सम्मानजनक, सुरक्षित और अपने रोजगार के उचित दूरी पर आवास पा सके।
नोएडा की चमक तभी पूरी होगी, जब उसके विकास की योजना में उन लोगों के लिए भी जगह होगी जो इस शहर को रोज चलाते हैं।
(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)





